ये हम ही थे` हमारे पास
जब भी हम रोए , किसी दुसरे के कंधे की उम्मीद की ,
पर अपने उपर ही रोए
थे हम ही हमारे साथ
सुबह शाम पूजा करने लगे ,
सच भी तो था ,केवल हम ही थे हमारे पास ,
मन के दुसरे भाग ने ,
जितनी ज्यादा साथ की चाह की ,
उतने अकेले होते चले गये ,
उतने अकेले की कभी -कभी ,
अपना पास भी छूट गया ,
अपने आप में इतना उलझे की ,
कुछ दूसरा काम ही नही
अपने लिए कुछ ना किया , तो पाते कहा से ,
अब एक चीज की चाह है
हम होऊ हमारे जुड़े हाथ हो`ओ और तुम्हारे चरण हो
हम हों हमारे साथ औरहो इसी चाह के साथ
जो आस तुमसे जोड़ी है , देखो तोड़ न देना ,
जब अंत होगा , तब ह म होगे हमारे साथ
जलेगे -बरेगे तो हमी होगे हमारे साथ ,
जब आए थे तो कौन था हमारे साथ ,
हमही थे अपने रोने -हसने को ,
सिर्फ़ हमही थे हर बार अपने साथ
इती
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Sunday, January 4, 2009
Saturday, January 3, 2009
हवाएँ
ये हवाएँ सब कुछ उड़ा के ले जायेंगी
ये मकान तो हमेशा, ऐसा ना रह जायेगा,
कितने हवा-महल बने हैं आज तक,
कहाँ टिका है कोई उनमें आज तक ,
ये सर्द काली हवाएँ, ये शीतल बयार ,
ये गरमी से तपती लू ,ये बसंती बयार ,
ये अपने तरीकों से घरों में रहना , और
हवाओं के कारण बिखर जाना ,
हवाओं को कौन रोक पाया है अब तक ,
सब रिश्तों के बीच, गर्म सर्द हवाएँ हैं अभी तक
आओ आने वाली हवाओं पे निसार हो जाओ ,
जो चले गए यहाँ से ,वो कुर्बान इन हवाओं पर ,
कब से बह रहीं हैं , इनके वेग को ना कोई जाना ,
कहाँ से आती जाती हैं, इनके हाल को न कोई जाना ,
ये हवाएँ सब कुछ उड़ा के ले जायेंगी ,
ना ज़मीन की , ना आसमान की हो पायेंगी
ये थीं किसकी जो तुम्हारी कहलायेंगी।
ये मकान तो हमेशा, ऐसा ना रह जायेगा,
कितने हवा-महल बने हैं आज तक,
कहाँ टिका है कोई उनमें आज तक ,
ये सर्द काली हवाएँ, ये शीतल बयार ,
ये गरमी से तपती लू ,ये बसंती बयार ,
ये अपने तरीकों से घरों में रहना , और
हवाओं के कारण बिखर जाना ,
हवाओं को कौन रोक पाया है अब तक ,
सब रिश्तों के बीच, गर्म सर्द हवाएँ हैं अभी तक
आओ आने वाली हवाओं पे निसार हो जाओ ,
जो चले गए यहाँ से ,वो कुर्बान इन हवाओं पर ,
कब से बह रहीं हैं , इनके वेग को ना कोई जाना ,
कहाँ से आती जाती हैं, इनके हाल को न कोई जाना ,
ये हवाएँ सब कुछ उड़ा के ले जायेंगी ,
ना ज़मीन की , ना आसमान की हो पायेंगी
ये थीं किसकी जो तुम्हारी कहलायेंगी।
Tuesday, December 30, 2008
हँसी
मन- मस्तिष्क पर उग आये
अनेक विचार, व कामनायें
हृदय में पनप गये
अनेकों विचार, व कामनायें
जो जीवन पर्यन्त विकसित
ही होते गए और आशाओं का इन्द्रधनुष,
और आपस में उलझते गये
उनमें अचानक एक संधि सी हो गई ,
मन मस्तिष्क और हृदय ने
पहले बातें की, फिर हँस पड़े
और उनकी इस हँसी से
उनके गगन पर छाए
सारे बादल छँट गए,
अब उनका निश्चय है
कि हृदय पर या मन पर
कुछ भी उगने ना दो
जो उगता हए, वो बढ़ता है
फिर पनप कर पूरे में छा जाता है
छा कर अन्धकार व घुटन में बदल जाता है
बचपन में जो उगता था
भाग -दौड़ में, खेल - कूद में
सारा का सारा झड़ जाता था
युवावस्था में वैसी हलचल तो थी नहीं,
सो जमावड़ा बढ़ता गया
और मन और हृदय उसके तले दबता गया
आज अचानक उस हँसी ने अंधकार को काट दिया
और स्वयं बादल बन कर
नीले गगन में तैर गया
ये जीत थी मन की
ये जीत थी उस हृदय की
जो नहीं जानता था, उड़ना या तैरना !
अनेक विचार, व कामनायें
हृदय में पनप गये
अनेकों विचार, व कामनायें
जो जीवन पर्यन्त विकसित
ही होते गए और आशाओं का इन्द्रधनुष,
और आपस में उलझते गये
उनमें अचानक एक संधि सी हो गई ,
मन मस्तिष्क और हृदय ने
पहले बातें की, फिर हँस पड़े
और उनकी इस हँसी से
उनके गगन पर छाए
सारे बादल छँट गए,
अब उनका निश्चय है
कि हृदय पर या मन पर
कुछ भी उगने ना दो
जो उगता हए, वो बढ़ता है
फिर पनप कर पूरे में छा जाता है
छा कर अन्धकार व घुटन में बदल जाता है
बचपन में जो उगता था
भाग -दौड़ में, खेल - कूद में
सारा का सारा झड़ जाता था
युवावस्था में वैसी हलचल तो थी नहीं,
सो जमावड़ा बढ़ता गया
और मन और हृदय उसके तले दबता गया
आज अचानक उस हँसी ने अंधकार को काट दिया
और स्वयं बादल बन कर
नीले गगन में तैर गया
ये जीत थी मन की
ये जीत थी उस हृदय की
जो नहीं जानता था, उड़ना या तैरना !
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